स्वागतम्
भारतीय संविधान में उल्लिखित पाँच न्यायिक रिट
कृपया पोस्ट शेयर करें...

भारतीय संविधान में उल्लिखित पाँच न्यायिक रिट निम्न प्रकार हैं | भारतीय संविधान का अनुच्छेद-32 का खण्ड (2) माननीय उच्चतम न्यायालय को ऐसे निर्देश, आदेश या रिट जारी करने की शक्ति देता है जो समुचित हो | संविधान में उल्लिखित ये पाँच न्यायिक रिट इस प्रकार हैं – बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार-पृच्छा और उत्प्रेषण | इन रिटों को उच्च न्यायालय भी संविधान के अनुच्छेद-226 के अन्तर्गत निकाल सकता है |

बंदी प्रत्यक्षीकरण ( Habeas Corpus )

इंग्लैंड में इसे हैबियस कार्पस कहते हैं Habeas Corpus” एक लैटिन शब्द है जिसका अर्थ है शरीर उपस्थित करना या शरीर लेकर आना। यह रिट किसी भी सरकारी या गैर-सरकारी व्यक्ति को सम्बोधित हो सकती है यह उस व्यक्ति की प्रार्थना पर जारी की जाती है जिसको लगता है कि उसे अवैध रूप से बंदी बनाया गया है इसमें  व्यक्ति को बंदी बनाये जाने के कारणों  एवं वैधता की न्यायलय द्वारा जाँच की जाती है।  इस रिट के द्वारा न्यायालय बंदी बनाये गये किसी व्यक्ति को अपने समक्ष प्रस्तुत करने का आदेश दे सकता है | जिससे व्यक्ति को बंदी बनाये जाने के कारणों का परीक्षण किया जा सके | इस प्रकार यह रिट नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रति महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रदान करती है |

परमादेश ( Mandamus )

इंग्लैंड में इस रिट को मेंडमस नाम से जाता है जिसका अर्थ है समादेश या आदेश | यह एक उच्च आदेश है जिसके माध्यम से किसी व्यक्ति, निगम, कनिष्ठ न्यायालय, सरकार या किसी लोक प्राधिकारी को रिट में विनिर्दिष्ट किसी कार्य को कराने हेतु निदेश दिया जाता है | ताकि मूल अधिकारों को सुरक्षित रखा जा सके | सामान्यतः न्यायालय परमादेश देता है तो मामला अंतिम रूप से समाप्त हो जाता है | परन्तु उच्चतम न्यायालय ने एक नया उपकरण निरन्तर परमादेश का आविष्कार किया है | न्यायालय इसका उपयोग वहाँ करता है जहाँ यह प्रतीत होता है कि किसी विषय को लगातार निगरानी या दृष्टि में रखना आवश्यक है और एक आदेश से न्याय नहीं हो सकेगा |

इसे भी पढ़ें...  उत्तर प्रदेश के जिले (All Districts of UP)
अधिकार पृच्छा ( Quo Warranto )

लोक पद अथवा उससे जुड़े हुए व्यक्तियों के अधिकारों व शक्तियों का परीक्षण को वारंटो रिट के माध्यम से होता है | इस रिट द्वारा न्यायालय किसी लोक अधिकारी से यह पूछ सकता है कि वह किस अधिकार से उक्त कार्य को कर रहा है तथा अनुचित होने पर उक्त कार्य को करने से रोका जा सकता है |

प्रतिषेध ( Prohibition )

प्रतिषेध की रिट किसी वरिष्ठ न्यायालय द्वारा किसी कनिष्ठ न्यायालय या अर्धन्यायिक अधिकरणों को जारी की जाती है जिससे वह ऐसी अधिकारिता का प्रयोग न करे जो उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर हो | यह कनिष्ठ न्यायालय या अधिकरण को उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर कार्य करने से रोकती है |

उत्प्रेषण ( Certiorari )

प्रतिषेध तथा उत्प्रेक्षण दोनों ही समान कारणों पर जारी की जाती हैं | परन्तु दोनों में एक मुख्य अन्तर यह है कि प्रतिषेध की रिट तब जारी होती है जब निर्णय न दिया गया हो और उत्प्रेक्षण की रिट तब जारी होती है जब निर्णय दे दिया गया हो, जो उच्च या उच्चतम न्यायालय के अधिकार का उल्लंघन हो | उत्प्रेक्षण ऐसे प्राधिकारी के विरुद्ध भी जारी हो सकता है जो अधिकारिता के भीतर कार्य कर रहा है किन्तु जिसने नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध कार्य किया हो |

इसे भी पढ़ें...  मिज़ोरम सामान्य ज्ञान (Mizoram General Knowledge)

** प्रतिषेध और उत्प्रेषण- न्यायालय द्वारा सिर्फ न्यायालय के  विरुद्ध जारी की जाती है।

इन उपर्युक्त पाँच न्यायिक रिट से विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्न आते हैं |

WhatsApp पर सुगम ज्ञान से जुड़ें

सुगम ज्ञान से कोई प्रश्न पूछने या सुझाव देने के लिए हमारे मोबाइल नम्बर 8410242335 पर WhatsApp करेें और हमारे सामान्य ज्ञान/समसामयिकी WhatsApp Group से जुड़ें, धन्यवाद।

चर्चा
(अब तक देखा गया कुल 10,345 बार, 10 बार आज देखा गया)
कृपया पोस्ट शेयर करें...
Close Menu