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सल्तनत कालीन स्थापत्य कला (Sultanate Period Architecture) – सल्तनत कालीन स्थापत्य में हिंदू-मुस्लिम कला का मेल-जोल देखने को मिलता है। इसमें भारतीय स्थापत्य की क्षैतिज शैली और इस्लामिक मेहराब देखने को मिलता है। जब तुर्क भारत आये तो वे अपने साथ स्थापत्य संबंधी कारीगर नहीं लाये थे।

कुव्वत उल इस्लाम –

पर्सी ब्राउन ने इसे भारत में पहला इस्लामी प्रयोग माना है। यह दिल्ली में रायपिथौरा के निकट अवस्थित एक मस्जिद है। इसका निर्माण ऐबक ने पृथ्वीराज चौहान पर विजय के उपलक्ष्य में 1197 ईo में करवाया था। यह मूलतः एक जैन मंदिर था जिसे वैष्णव मंदिर में परिवर्तित किया गया था। ऐबक ने इसे मस्जिद में परिवर्तित कर दिया, यह दिल्ली में तुर्कों की पहली मस्जिद थी। इसके बाद इल्तुतमिश और बाद में अलाउद्दीन खिलजी ने इस मस्जिद का विस्तार किया। अलाउद्दीन खिलजी ने इस पर कुरान की आयतें खुदवाईं।

कुतुबमीनार –

सूफी संत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी के नाम पर इसका नाम कुतुबमीनार रखा। 1197 ईo में इसका निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ। कुतुबुद्दीन ऐबक इसका निर्माण अजान देने के लिए करवाना चाहता था। परन्तु यह एक विजय स्तंभ है। इसकी ऊँचाई 71.5 मीटर है जो कि 5 मंजिला है। ऐबक ने इसकी सिर्फ पहली मंजिल का ही निर्माण कराया था। इसके ऊपर की तीन मंजिलें इल्तुतमिश ने 1231-32 ईo में बनवायीं। अतः पहले इसमें कुल चार मंजिलें थी। फिरोज तुगलक के समय बिजली गिरने के कारण इसकी ऊपरी मंजिल ध्वस्त हो गयी थी। इसके बदले में फिरोज तुगलक ने इसकी मरम्मत कराई और एक मंजिल और जोड़ दी। बाद में सिकंदर लोदी ने भी इसकी मरम्मत कराई। इसमें लाल व सफ़ेद बलुआ पत्थरों का प्रयोग किया गया है। इस मीनार का वास्तुकार एवं पर्यवेक्षक फजल-इब्न-अबुल-माली (निजाम तालिब) था।

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अढ़ाई दिन का झोपड़ा –

कुतुबुद्दीन ऐबक ने अजमेर में 1200 ईo में अढ़ाई दिन का झोपड़ा नामक मस्जिद बनवाई थी। यह पहले एक मठ या बिहार हुआ करता था।

सुल्तानगढ़ी –

इल्तुतमिश ने अपने पुत्र नासिरुद्दीन का मकबरा सुल्तानगढ़ी के नाम से बनवाया। इसका निर्माण 1231 ईo में कुतुबमीनार से तीन मील की दूरी पर मलकापुर में करवाया। इसी के साथ इल्तुतमिश को भारत में मकबरा शैली का जनक कहा जाता है।

किलोखरी महल –

इसका निर्माण कैकुबाद ने प्रारंभ करवाया था और जलालुद्दीन खिलजी ने इसे पूर्ण करवाया।

अलाई दरवाजा –

यह कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद का भव्य प्रवेश द्वार है। इसका निर्माण अलाउद्दीन खिलजी ने कराया। इसे इस्लामी वास्तुकला का रत्न कहा जाता है। इसका निर्माण कार्य 1311 ईo में पूरा हुआ। इसमें संगमरमर और बलुआ पत्थर का साथ-साथ प्रयोग हुआ है। मार्शल ने इसे इस्लामी स्थापत्य कला के खजाने का सबसे सुंदर नग कहा है। इसका गुंबद वैज्ञानिक पद्यति से बनाया गया पहला गुंबद है। सर्वप्रथम इसी स्थापत्य में घोड़े की नाल की आकृति के मेहराब का प्रयोग किया गया। तिकोने डॉट पत्थरों के आधार पर निर्मित यह पहला भवन है।

सल्तनत कालीन स्थापत्य कला संबंधी अन्य तथ्य

  • तुर्कों के समय कला का प्रमुख नमूना अरबी लिपि थी।
  • अलंकरण की संयुक्त विधि अरबस्क कहलाती थी।
  • इल्तुतमिश ने बदायूँ में जामा मस्जिद, नागौर में अतरकीन का दरवाजा बनवाया।
  • बलबन ने स्वयं का मकबरा और लाल महल बनवाया।
  • बलबन का मकबरा शुद्ध इस्लामी पद्यति में भारत में निर्मित पहला मकबरा है।
  • अलाउद्दीन खिलजी ने सीरी महल और हजार स्तंभों वाला महल बनवाया।
  • अलाउद्दीन खिलजी ने सभी इमारतें पूर्णतः इस्लामी विचारधारा के अनुकूल ही बनवायीं।
  • अलाउद्दीन खिलजी ने निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर जमात खाना मस्जिद का निर्माण कराया।
  • अलाउद्दीन ने सीरी के निकट हौज-ए-अलाई या हौज-ए-ख़ास नामक तालाब बनवाया।
  • तुगलक कालीन स्थापत्य में तात्कालिक राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक समस्याओं की झलक देखने को मिलती है।
  • तुगलक शासक अपने इमारतों में आसानी से उपलब्ध सस्ता मटमैला पत्थर लगवाते थे।
  • तुगलक स्थापत्य शैली की महत्वपूर्ण विशेषता ढलवा दीवारें (सलामी पद्यति) हैं।
  • गयासुद्दीन का मकबरा कृत्रिम झील के बीच एक ऊँचे चबूतरे पर बना है।
  • मुहम्मद बिन तुगलक ने दिल्ली के निकट जहाँपनाह नगर और तुगलकाबाद के निकट आदिलाबाद का किला बनवाया।
  • फिरोज तुगलक ने हौज ख़ास पहाड़ी के पास अपना व अपने वजीर खान-ए-जहाँ-तेलंगनी का मकबरा बनवाया।
  • खान-ए-जहाँ-तेलंगनी का मकबरा दिल्ली में निर्मित प्रथम अष्टभुजीय मकबरा है।
  • फिरोज तुगलक की सभी इमारतों में कमल की आकृति के नमूने मिले हैं।
  • सिकंदर लोदी के समय एक गुम्बद की जगह दो गुम्बदों की शैली की शुरुवात हुयी।
  • लोदी काल को मकबरों का काल भी कहा जाता है।
  • दिल्ली की मोठ मस्जिद का निर्माण सिकंदर लोदी के समय उसके प्रधानमंत्री द्वारा कराया गया।

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