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भगवान गौतम बुद्ध ( Bhagwan Gautam Buddha ) का जीवन परिचय – छठी शताब्दी ईसा पूर्व हुए धार्मिक आंदोलन में बौद्ध और जैन धर्म दोनों ही की अपनी भूमिका है। यहाँ पर हमने बौद्ध धर्म के संस्थापक महात्मा गौतम बुद्ध से सम्बंधित महत्वपूर्ण जानकारी को साझा किया है :-

जन्म 563 ईo पूo
जन्म स्थान लुम्बिनी ( रुम्मिनदेई )
बचपन का नाम सिद्धार्थ
माता महामाया
पिता शुद्धोधन
पत्नी यशोधरा
पुत्र राहुल
गोत्र गौतम
जन्म का प्रतीक कमल
महाभिनिष्क्रमण ( गृहत्याग )29 वर्ष की अवस्था में
ज्ञान प्राप्ति निरंजना नदी तट पर उरुबेला में
उपदेश की भाषा मागधी
प्रथम उपदेश ( धर्मचक्रप्रवर्तन )ऋषिपट्टनम के मृगदाव में
प्रथम वर्षावास सारनाथ के मूलगंधकुटी विहार में
अंतिम वर्षावास वैशाली के वेलुवग्राम
मृत्यु ( महापरिनिर्वाण )483 ईo पूo में कुशीनगर में

महात्मा बुद्ध का जन्म वैशाख माह के पुष्य नक्षत्र में 563 ईo पूo में कपिलवस्तु के लुम्बिनी ग्राम में हुआ था। इनके पिता शुद्धोधन कपिलवस्तु के शाक्य गणराज्य के प्रधान थे। इनकी माता महामाया कोलिय गणराज्य की राजकुमारी थीं। इनके जन्म के सातवें दिन ही इनकी माता का स्वर्गवास हो गया था। अतः इनका पालन-पोषण मौसी प्रजपति गौतमी ने किया। इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था। 16 वर्ष की अवस्था में इनका विवाह शाक्य कुल की कन्या यशोधरा से हुआ। इनसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ जिसका नाम राहुल रखा गया।

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बुद्ध का हृदय परिवर्तन –

बुद्ध के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटना तब घटी जब वे अपने सारथी चन्ना के साथ भ्रमण के लिए निकले। तत्पश्चात इन्होंने क्रमशः तीन दृश्य देखे। जिसका वर्णन अंग्रेजी लेखक सर एडविन अर्नाल्ड ने अपनी रचना “Light of Asia” में बहुत अच्छे से किया है।

  1. एक बूढ़ा व्यक्ति
  2. एक बीमार व्यक्ति
  3. एक अर्थी / मृत व्यक्ति
  4. सन्यासी ( प्रसन्न मुद्रा में )

इसी यात्रा से इनके जीवन की वास्तविक यात्रा का प्रारम्भ होता है। यहीं से उनका हृदय परिवर्तन हुआ। उन्हें इस दुनिया को एक अलग ही नजरिये से देखने का एक मौका मिला। इन सभी दृश्यों को देखने के बाद रात भर इन्हें नींद नहीं आयी। अंत में इन्होंने इनमें से अंतिम दृश्य अर्थात सन्यास के मार्ग पर चलने का निश्चय किया।

गृहत्याग ( महाभिनिष्क्रमण ) –

इन्होंने राजमहल और अपनी वैवाहिक सुख सुविधाओं को छोड़कर 29 वर्ष की अवस्था में गृह त्याग दिया। इस घटना को बौद्ध धर्म में महाभिनिष्क्रमण कहा गया। गृहत्याग के बाद अनोमा नदी के तट पर अपना सर मुंडवाया और भिक्षु काषाय वस्त्र धारण किये। ये सर्वप्रथम अनुपिय नाम आम्र उद्यान में कुछ दिन तक रुके। वैशाली के समीप इनकी मुलाकात सांख्य दर्शन के विद्वान आचार्य अलार कलाम से हुयी। राजगृह के समीप इनकी मुलाकात धर्माचार्य रुद्रक रामपुत्र से हुयी। ये ही दोनों बुद्ध के प्रारंभिक गुरु थे। इसके बाद ये उरुबेला ( बोधगया ) गए जहाँ इन्हें कौडिन्य आदि पाँच साधक मिले।

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ज्ञान की प्राप्ति –

6 वर्ष की अथक प्रयत्न और घोर तपस्या के बाद 35 वर्ष की अवस्था में वैशाख पूर्णिमा की रात निरंजना नदी के तट पर पीपल / वट ( बोधिवृक्ष ) के नीचे इन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुयी। उसी दिन से ये ‘तथागत‘ कहलाये जाने लगे। ज्ञान प्राप्ति के बाद ही ये गौतम बुद्ध नाम से प्रचलित हुए।

धर्मचक्रप्रवर्तन –

इन्होंने अपना पहला उपदेश ऋषिपट्टनम / मृगदाव ( सारनाथ ) में 5 ब्राह्मण सन्यासियों को दिया। इसी प्रथम उपदेश को बौद्ध धर्म में धर्मचक्रप्रवर्तन के नाम से जाना जाता है।

महापरिनिर्वाण –

इनकी मृत्यु हिरण्यवती नदी के तट पर कुशीनारा में 483 ईo पूo 80 वर्ष की अवस्था में अतिसार के कारण हो गयी। इसे बौद्ध धर्म में महापरिनिर्वाण कहा गया।

स्तूप क्या हैं ?

स्तूप का शाब्दिक अर्थ किसी वस्तु का ढेर होता है। इसे चिता के स्थान पर बनाए जाने के कारण इसका एक नाम चैत्य भी है। स्तूप का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। ऋग्वेद में अग्नि की उठती हुई ज्वालाओं को स्तूप कहा गया। महात्मा बुद्ध की मृत्यु के बाद उनकी अस्थि अवशेषों के 8 भाग किये गए। इन आठों भागों पर समाधियाँ बनाई गईं, सामान्यतः इन्हें ही स्तूप की संज्ञा दी जाती है। स्तूपों के निर्माण की प्रथा बुद्धकाल से पूर्व की है।

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