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कश्मीर के राजवंश : कार्कोट वंश, उत्पल वंश, लोहार वंश

राजतरंगिणी

कश्मीर का इतिहास जानने के लिए कल्हण की राजतरंगिणी को प्रथम ऐतिहासिक पुस्तक का दर्जा प्राप्त है। इसमें आदिकाल से 1151 ईo तक का वर्णन है। कल्हण जाति से ब्राह्मण था, यह हर्ष का आश्रित कवि था। उसने राजतरंगिणी की रचना जयसिंह के शासनकाल में 1149-50 ईo में पूरी की। इसकी रचना संस्कृत भाषा में महाभारत की शैली पर आधारित है। राजतरंगिणी का अंतिम शासक यही है। इसमें आठ तरंग/अध्याय एवं लगभग 8000 श्लोक हैं। जोनराज ने राजतरंगिणी का विस्तार सुल्तान जैनुलाब्दीन के काल तक किया। इसके बाद श्रीवर तदोपरांत प्राज्ञभट्ट व सुका ने मिलकर इसका विस्तार किया। कल्हण ने अपने से पहले के 11 इतिहासकारों का वर्णन किया है और उनकी कमियाँ भी गिनाईं हैं। कल्हण अशोक को कश्मीर का पहला मौर्य शासक और श्रीनगर का संस्थापक बताते हैं। इसके अनुसार कनिष्क ने यहाँ पर कनिष्कपुर बसाया। इसी के अनुसार नरसिंह बालादित्य ने मिहिरकुल को हराया। इससे मिहिरभोज की उपलब्धियों की भी जानकारी प्राप्त होती है।

कार्कोट वंश

कार्कोट वंश की स्थापना सातवीं शताब्दी में दुर्लभ वर्धन ने गोनंद वंश के अंतिम शासक बालादित्य की हत्या करके की थी। यह कन्नौज के शासक हर्षवर्धन के समकालीन था। इसने कश्मीर में रखे बुद्ध के दांतों को हर्षवर्धन को लाकर भेंट किया। इसी के समय ह्वेनसांग ने कश्मीर में दो वर्ष बिताये। इसका उत्तराधिकारी दुर्लभक हुआ। इसने प्रतापादित्य की उपाधि धारण की और प्रतापपुर नामक नगर बसाया। इसके बाद क्रमशः चन्द्रापीड़/वज्रादित्य, तारपीड़/उदयादित्य, मुक्तिपीड़/ललितादित्य शासक हुए।

ललितादित्य मुक्तिपीड –

इस वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था। इसने कन्नौज के यशोवर्मन के साथ संधि करके तिब्बतियों को हराया। बाद में इसने यशोवर्मन को भी पराजित कर दिया और उसके दरबारी वाक्पति और भवभूति को कश्मीर ले आया। इसके अतिरिक्त इसने तुर्कों और कम्बोजों को भी परास्त किया। इसने 733 ईo में चीन में दूतमण्डल भेजा। यह एक महान निर्माता भी था। इसने कश्मीर में सूर्य के मार्तण्ड मंदिर का निर्माण कराया और परिहासपुर नगर बसाया। उत्तर-प्रदेश के बांदा जिले से ललितादित्य मुक्तिपीड़ के सिक्के प्राप्त हुए हैं। अंत में इसकी मृत्यु ठण्ड से हो गयी।

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इस वंश का अंतिम शासक जयापीड विनयादित्य था।

उत्पल वंश

उत्पल वंश की स्थापना अवन्तिवर्मन ने 855 ईo में की थी। यह अपने मंत्री सूर के साथ शासन करता था। इसने कश्मीर में अवन्तिपुर नगर की स्थापना की। इसकी मृत्यु उरशा (आधुनिक हाजरा) में हो गयी। इसकी पत्नी सुगंधा इसके बाद शासन की संचालिका बनी। इसके बाद इसके उत्तराधिकारियों में गृहयुद्ध शुरू हो गया। इनमे उसका वैध उत्तराधिकारी शंकरवर्मन विजयी रहा और अगला शासक बना। इसने बहुत से युद्ध किये और राजकोष खाली हो गया। इसके लिए इसने जनता पर तरह तरह के कर लगाए और मंदिरों को लूटा। इनके चलते प्रजा में वह अत्यंत अलोकप्रिय हो गया और क्रूर शासक के रूप में जाना जाने लगा। इसके बाद क्षेमेन्द्रगुप्त अगला शासक बना। इसने लोहार वंश की राजकुमारी दिद्दा से विवाह किया। क्षेमेन्द्र के बाद कश्मीर की सत्ता रानी दिद्दा के हाथों में लगभग 50 वर्षों तक रही। ये एक महत्वाकांक्षी व दुराचारिणी शासिका थी। इसका नाम सिक्कों पर भी अंकित किया जाने लगा।

लोहार वंश

लोहार वंश की स्थापना संग्राम राज ने 1003 ईo में की थी। इसने अपने मंत्री तुंग को भटिण्डा के शासक त्रिलोचन पाल की ओर से महमूद गजनबी से लड़ने भेजा। इसके बाद अनन्त और उसकी पत्नी सूर्यमती ने संयुक्त रूप से शासन किया। बाद में अनन्त ने आत्महत्या कर ली। इसके बाद कलश तदुपरांत हर्ष शासक बना। इस वंश के राजाओं में हर्ष (कश्मीर का नीरो) सर्वाधिक प्रसिद्ध था। वह स्वयं विद्वान, कवि और बहुत सी भाषाओँ व विधाओं का ज्ञाता था। कल्हण इसी का आश्रित कवि था। इसने भी खाली राजकोष को भरने के लिए बहुत से कर लगाए और मंदिरों को लूटा। इसके समय कश्मीर में भयंकर अकाल पड़ा फिर भी इसने दमनपूर्ण करों को नहीं हटाया। इसके अत्याचार से त्रस्त होकर दो भाइयों उच्चल व सुस्सल ने विद्रोह कर दिया। इन ने श्रीनगर में घुसकर राजमहल में आग लगा दी और हर्ष के पुत्र भोज की हत्या कर दी। विद्रोहियों का मुकाबला करते हुए हर्ष भी 1101 ईo में मारा गया।

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जयसिंह (1128-55 ईo) –

जयसिंह इस वंश का अंतिम शासक था। कल्हण की राजतरंगिणी का विवरण इसी शासक तक मिलता है। इसके काल में कश्मीर ने धर्म, दर्शन, कला व साहित्य के क्षेत्र में अत्यधिक विकास किया।

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