गुप्त वंश की जानकारी
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गुप्प्तत वंश की जानकारी – कुषाणों के पतन के पश्चात् उत्तर भारत में बहुत से राजवंशों का उदय हुआ जिनमे सबसे शक्तिशाली व सुदृढ़ राजवंश था गुप्त वंश। प्रराम्भिक गुप्त संभवतः कुषाणों के सामंत रहे होंगे।  भारतीय इतिहास के प्रथम व्यवस्थित साम्राज्य मौर्य वंश के बाद यदि कोई महत्वपूर्ण वंश हुआ है तो  वह गुप्त वंश ही है। गुप्तों की उत्पत्ति के बारे में भी विद्वानों में मतभेद है कोई उन्हें शूद्र मानता है कोई क्षत्रिय, कोई वैश्य तो कोई ब्राह्मण परन्तु गुप्त शासक धारण गोत्र के थे इसकी जानकारी प्रभावती गुप्त के पूना ताम्रपत्र लेख से प्राप्त होती है। गुप्त काल को प्राचीन भारतीय इतिहास का क्लासिकल युग न तो युद्धों बल्कि कला व साहित्यिक समृद्धि के लिए कहा जाता है।

गुप्त वंश के शासक :-

श्रीगुप्त

घटोत्कच

चन्द्रगुप्त प्रथम

समुद्रगुप्त

चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य)

कुमारगुप्त/महेन्द्रादित्य

स्कंदगुप्त

पुरुगुप्त

नरसिंहगुप्त (बालादित्य)

कुमारगुप्त द्वितीय, बुधगुप्त, भानुगुप्त

वैन्यगुप्त, कुमारगुप्त द्वितीय

विष्णुगुप्त तृतीय

गुप्त साम्राज्य के प्रमुख शासको के बारे में जानकारी –

श्रीगुप्त 

इसने ‘महाराज’ की उपाधि धारण की थी जो कि प्रायः सामंतो की उपाधि होती थी। इससे अनुमान लगाया जाता है कि शायद वह किसी शासक (संभवतः कुषाणों) के अधीन था।

चन्द्रगुप्त प्रथम (319-335 ईo)

इसे गुप्त साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। जो गुप्त साम्राज्य पहले सिर्फ मगध के कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित था ,इसने उसका विस्तार इलाहबाद तक किया।

यह प्रथम गुप्त शासक था जिसने ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि धारण की और स्वयं के स्वतन्त्र होने का प्रमाण प्रस्तुत किया, नया संवत (गुप्त सम्वत 319-20 ईo) चलाया जो की इसके शासक बनने की तिथि को निर्दिष्ट करता है।

लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह किया, इसी राजकुमारी से आगे चलकर समुद्रगुप्त उत्पन्न होता है।

इसने अपने जीवनकाल में ही समुद्रगुप्त को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था परन्तु फिर भी उसे उत्तराधिकार का युद्ध लड़ना पड़ा था।

समुद्रगुप्त (335-375 ईo)

समुद्रगुप्त गुप्त वंश का अत्यंत ही प्रतापी शासक था इसीलिए उसे विंसेट स्मिथ ने भारत का नेपोलियन की संज्ञा दी है।

समुद्रगुप्त ने उत्तर भारत (आर्यावर्त) के 9 शासकों और दक्षिणापथ के 12  शासको को पराजित किया। इसे 100 युद्धों का विजेता कहा जाता है, इसके शरीर पर युद्धों में लगे 100 घाव थे और यह कभी किसी से पराजित नहीं हुआ।

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महान बौद्ध भिक्षु वसुबन्धु को संरक्षण दिया।

इसके सिक्कों पर इसे वीणावादन मुद्रा में अंकित किया गया है जो  इसके संगीतप्रेमी होने को दर्शाता है इसीलिए इसे कविराज की उपाधि दी गयी है।

गुप्त अभिलेखों में समुद्रगुप्त की दक्षिण विजय को धर्मविजय कहा गया है।

इसके पराक्रम को देख शक, कुषाण, मुरुण्ड इत्यादि ने इसकी अधीनता स्वीकार ली।

इसे लिच्छवि दौहित्र भी कहा गया है क्योकि इसकी माता (कुमारदेवी) लिच्छवि राजवंश की कन्या (दुहिता) थी।

इसके काल के मुख्तयः 6 प्रकार के सिक्के प्राप्त हुए हैं जो कि धनुर्धारी प्रकार के, गरुण प्रकार के, अश्वमेद्य प्रकार के, परशु प्रकार के, व्याघ्रहनन प्रकार के और वीणावादन प्रकार के।

**प्रयाग प्रशस्ति :

प्रशस्ति का अर्थ होता है ‘प्रशंसा में की गयी रचना’ अर्थात यह प्रशस्ति समुद्रगुप्त की प्रशंसा में की गयी रचना है। यह मूल रूप से कौशाम्बी में अशोक स्तम्भ पर उत्कीर्ण थी जिसे अकबर काल में जहांगीर द्वारा इलाहबाद के किले में स्थापित कराया गया। इसकी रचना समुद्रगुप्त के राजकवि हरिषेण द्वारा संस्कृत भाषा में की गयी थी। इसकी लिपि ब्राह्मी तथा शैली चम्पू है। प्रयाग प्रशस्ति में ही सर्वप्रथम “भारतवर्ष” का जिक्र मिलता है।

**समुद्रगुप्त के बाद रामगुप्त नाम का एक दुर्बल शासक बनता है जो शकों से पराजित हो जाने के बाद अपनी पत्नी ध्रुवस्वामिनी शकों को देना स्वीकार करता है परन्तु उसकी जगह चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य शकों के खेमे में चला जाता है और शक शासक को मार डालता है बाद में रामगुप्त की भी हत्या करके स्वय शासक बन जाता है। इस सब की जानकारी विशाखदत्त कृत “देवीचन्द्रगुप्तम” नाटक से प्राप्त होती है।

चन्द्रगुप्त द्वितीय -विक्रमादित्य (380-412 ईo)-

विक्रमादित्य का अर्थ होता है ‘पराक्रम का सूर्य’  यह भी अत्यंत प्रतापी शासक था जिसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की परन्तु  चन्द्रगुप्त को उसके काल की लड़ाइयों व युद्धों से ज्यादा कला व साहित्य के प्रति उसे अगाध अनुराग व प्रेम के लिए जाना जाता है। भारतीय अनुश्रुतियों में उसे शकारि अर्थात शकों का विजेता कहा गया है।

नाग राजकुमारी कुबेरनागा से विवाह कर नाग वंश से बैबाहिक संबंध स्थापत किये और बाद में अपनी पुत्री प्रभावती का विवाह वाकाटक नरेश रुद्रसेन द्वितीय से किया।

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कुतुबमीनार के निकट स्थित मेहरौली के लौह स्तम्भ पर खुदे अभिलेख में चंद्र नामक राजा की कीर्ति का वर्णन किया गया है  जिसकी पहचान चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के रूप में हुयी है।

इसी के काल में चीनी यात्री फाह्यान (399 – 414 ई o)आता है, परन्तु यह अपने यात्रा वृतांत में कहीं भी सम्राट का नामोल्लेख नहीं करता है।

इसके दरबार में 9 विद्वान रहते थे जिन्हे नवरत्न के नाम से जाना जाता था – कालिदास, धन्वंतरि, क्षपणक, अमरसिंह, वराहमिहिर इत्यादि……..

कुमारगुप्त (415-454 ईo)-

इसने कोई नई विजय नहीं की परन्तु सीमाओं को अक्षुण्य बनाये रखा।  इसके शासन की जानकारी वत्सभट्टी के मंदसौर अभिलेख से प्राप्त होती है, यह गुप्त शासको में सर्वाधिक लम्बे समय तक शासन करने वाला शासक था।  गुप्त शासको में सर्वाधिक अभिलेख इसी के शासनकाल से सम्बंधित हैं।  इसने भी अश्वमेद्य यज्ञ किये जिसकी जानकारी इसके सिक्कों से प्राप्त होती है।

-इसके समय पुष्यमित्रों का आक्रमण होता है जिन्हे इसके पुत्र स्कंदगुप्त द्वारा पराजित कर दिया जाता है।

-इसी के काल में नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना शक्रादित्य द्वारा की गयी। देवपाल ने बौद्ध भिक्षु वीरदेव को नालंदा का कुलपति नियुक्त किया। नालंदा में चिकित्सा शास्त्र का अध्ययन सभी के लिए अनिवार्य था। ह्वेनसांग यहाँ 18 माह रहा और योगशास्त्र का अध्ययन किया, इस समय विवि के कुलपति शीलभद्र थे।

स्कंदगुप्त (455-467 ईo)-

इसने राजधानी को अयोध्या स्थानांतरित किया।

भीतरी अभिलेख से ज्ञात होता है कि हूणों/मलेच्छों का प्रथम आक्रमण इसी के काल में हुआ था और ये हूणों के शासक ख़ुशनेबाज को पराजित कर देता है।

इसके काल में पुष्यमित्रों व हूणों के आक्रमण की जानकारी भीतरी स्तम्भ लेख से प्राप्त होती है।

इसी के समय भारी वर्षा के कारण सुदर्शन झील का बाँध टूट गया।

इसने चीनी सांग सम्राट के दरबार में दूत भेजा।

पुरुगुप्त

यह गुप्त शासकों में सर्वाधिक आयु में शासक बनता है।

यह पहला गुप्त शासक था जो बौद्ध अनुयायी था।

बुद्धगुप्त-

यह भी बौद्ध अनुयायी था।

इसकी मृत्यु के पश्चात् गुप्त साम्राज्य ३ शाखाओं में बँट गया :-

*मगध- नरसिंघ गुप्त बालादित्य (परमभागवत)

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*मालवा – भानुगुप्त 

*बंगाल – वैन्यगुप्त 

 

नरसिंघ गुप्त बालादित्य – 

ह्वेनसांग के अनुसार यह हूण नरेश मिहिरकुल को कर देता था परन्तु जब मिहिरकुल बौद्धों पर अत्याचार करने लगा तो इसने उसे कर देना बंद कर दिया।

भानुगुप्त –

भानुगुप्त के एरण अभिलेख से हूण आक्रमण में गुप्त सेनापति के मारे जाने के बाद उसकी पत्नी के सती होने की जानकारी प्राप्त होती है।  अतः “भानुगुप्त का एरण अभिलेख” ही सती प्रथा का प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य है।

विष्णुगुप्त तृतीय –

यह गुप्त वंश का अंतिम शासक था।

गुप्त वंश से सम्बंधित प्रमुख तथ्य :-

  • गुप्तकाल में ही शासन व्यवस्था में विकेन्द्रीकरण की प्रवृत्ति बढ़ने लगी।
  • विक्रमादित्य की उपाधि धारण करने वाले गुप्त शासक – समुद्रगुप्त, चन्द्रगुप्त द्वितीय, स्कंदगुप्त 
  • इस काल में शूद्रों की आर्थिक दशा में सुधार हुआ ,परन्तु स्त्रियों की दशा में पहले की अपेक्षा गिरावट आयी उनका उपनयन संस्कार बंद हो गया और इसके साथ साथ बाल विवाह, सती प्रथा, देवदासी प्रथा और पर्दा प्रथा का प्रचलन हो गया।
  • गुप्तकालीन सर्वाधिक सिक्के बयाना (भरतपुर – राजस्थान) से प्राप्त हुए हैं।
  • गुप्त वंश का राजचिन्ह गरुण था और गरुण प्रकार के सिक्को पर ही राजाज्ञा अंकित होती थी।
  • रामायण और महाभारत के अंतिम रूप का का सम्पादन इसी काल में हुआ माना जाता है।
  • देवगढ़ का दशावतार मंदिर इसी काल में बना है, जो कि पंचायतन शैली में निर्मित है ।
  • इस काल में बना उदयगिरि का मंदिर जिसमे बनी विष्णु के 12 अवतारों की विशाल मूर्ति प्रसिद्द है।
  • अजंता की कुल 29 गुफाओं में से गुफा संख्या 16, 17 व 19 इसी काल से संबंधित हैं।
  • इस काल में सर्वाधित उन्नति ज्योतिष व गणित के क्षेत्र में हुयी।  आर्यभट्ट इसी काल में हुए जो कि एक महान गणितज्ञ, खगोलशास्त्री और वैज्ञानिक थे।
  • वराहमिहिर ने “पंचसिद्धांतिका” नामक ज्योतिष ग्रन्थ और नागार्जुन ने “अष्टांगसंग्रह” नामक आयुर्वेदिक ग्रन्थ इसी काल में लिखा।
  •  पुराणों के आधुनिक रूप की रचना गुप्तकाल में ही हुयी।
  • शल्य चिकित्सा के पितामह सुश्रुत ने “सुश्रुत सहिंता” इसी काल में लिखी।
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