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सिख धर्म या सिख सम्प्रदाय –

जिस तरह इस्लाम में खलीफाओं और पैगम्बरों की और हिन्दू धर्म में अवतारों की मान्यता है उसी प्रकार सिख धर्म में वो स्थान गुरुओं को दिया गया है। सिख धर्म में कुल 10 गुरु हुए जो निम्नलिखित हैं –

सिख धर्म के संस्थापक व प्रथम गुरु – गुरुनानक देव 

‘सिख’ शब्द शिष्य शब्द का तद्भव रूप है अर्थात आगे चलकर वही सिख कहलाये जो कभी गुरुनानक देव जी के शिष्य थे और उनकी अगली पीढ़ियां भी सिख कहलायीं। सिख धर्म के संस्थापक गुरुनानक देव जी का जन्म 1469 ईo में तलवण्डी (आधुनिक ननकाना) में पिता कालूचन्द और माता तृप्ता देवी के घर में हुआ। इनका विवाह बटाला के मूलराज खत्री की पुत्री सुलक्षणी/सुलाखिन से हुआ जिनसे इनके दो पुत्र श्रीचन्द्र और लक्ष्मीदास हुए।

इन्होने रावी नदी के तट पर करतारपुर में अपना डेरा बनाया और यहीं से अपने शिष्यों को ज्ञान देते थे। परन्तु इन्होने गृहस्थ जीवन का परित्याग नहीं किया था। इनके दो शिष्य लहना व मर्दाना थे। लहना को नानक जी ने अपना उत्तराधिकारी चुना और ये ही आगे चलकर गुरु अंगद देव के नाम से विख्यात हुए और सिखों के दूसरे गुरु बने। इन्होने ही मुक्त सामुदायिक रसोई (गुरु का लंगर) की स्थापना की। ये मूर्ति पूजा के विरोधी थे और किसी भी धार्मिक ग्रन्थ में आस्था नहीं रखते थे। सिखों के आदि ग्रन्थ गुरु ग्रन्थ साहिब का भी संकलन इन्होंने नहीं बल्कि सिखों के 5 वें गुरे गुरु अर्जुनदेव ने किया था।

२- गुरु अंगद देव (1539-52)

इनका प्रारंभिक नाम लहना था जो बाद में गुरुनानक के पश्चात गुरु अंगद देव के नाम से सिखो के दूसरे गुरु बने। ये प्रारम्भ में दुर्गा के भक्त थे परन्तु नानक जी से मिलने के बाद वे उनके शिष्य बन गए और उनके साथ रहने लगे। 1540 ईo में जब हुमायूँ बिलग्राम के युद्ध में शेरशाह सूरी से पराजित हो गया था तब उसने गुरु अंगद देव से भेंट की थी। गुरु अंगद देव ने ही सर्वप्रथम गुरुमुखी लिपि का विकास किया।

3 – गुरु अमरदास (1552-74)

ये प्रारम्भ में वैष्णव थे। ये स्वयं किसानी और व्यापार करते थे और अपने शिष्यों को भी गृहस्थ ही रहकर पारिवारिक संत रहने का उपदेश दिया करते थे। इन्होने ही सती प्रथा और पर्दा प्रथा का विरोध किया और आनंद नामक पद्य की रचना की। जो व्यक्ति लंगर में सभी के साथ भोजन नहीं करता था ये उस से भेंट नहीं किया करते थे। इन्होने विवाह पद्यति को सरल बनाया जिसे लवन कहा जाने लगा। इन्होने अपनी प्रथम गद्दी गोइंदवाल में स्थापित की। इन्होने अपनी पुत्री बीबीभानी का विवाह रामदास से किया और इसी विवाह में अकबर ने गुरु अमरदास से भेंट की और रामदास को 5०० बीघा जमीन दी।

4 – गुरु रामदास (1574-81)

इन्होने विचार दिया की गुरु की आत्मा स्वतः ही अगले गुरु में चली जाती है। इन्होने ही गुरु के पद को अब वंशानुगत कर दिया। इनके अकबर से अच्छे संबंध थे अतः ये अकबर के दरबार में जाते रहते थे।अकबर द्वारा इनको दी गयी जमीन पर ही आधुनिक अमृतसर नगर की स्थापना की गयी थी।

5 – गुरु अर्जुनदेव (1581-1606)

व्यास नदी के तट पर स्थित गोविंदबाल में इनका निवास स्थल था। 

  • इन्होने तरनतारन और करतारपुर नामक नगरों की स्थापना की।
  • इन्होने ही अमृतसर में स्वर्णमंदिर का निर्माण कराया था।
  • कबर ने इन्हे बहुत सा स्वर्ण दान में दिया था जिसका प्रयोग इन्होने स्वर्णमंदिर में करवाया।
  • इन्होने ही धर्म की अभिवृद्धि हेतु एक अनिवार्य धार्मिक कर (1/10) लगाया।
  • इन्होने 1604 ईo में आदि ग्रन्थ का संकलन किया।
  • सिखो के 10 वें गुरु ने तेगबहादुर (9वें गुरु) की रचनाओं को भी इसमें सम्मिलित कर लिया और तब से यह गुरु ग्रन्थ साहिब कहलाने लगा।
  • इन्होने मुगलो की भाँति वैभवशाली जीवन जीना प्रारम्भ कर दिया और उन्ही की भांति दरबार लगाना भी प्रारम्भ कर दिया।
  • इन्होने गुरु हरगोविंद को यह आदेश दिया कि गद्दी पर शस्त्र से सुसज्जित होकर बैठें और एक शक्तिशाली सेना का गठन करें।
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इन्ही के समय से सिख सम्प्रदाय और मुगलो के संबंध ख़राब होने लगे। इन्होने विद्रोही खुशरो की मदद की और उसे शासक बनने का आशीर्वाद भी दिया। इसी कारण जहांगीर ने इन्हे पकड़ के लाने का हुक्म दिया। इन्हे पकड़ लिया गया और जहांगीर ने इन्हे मृत्यु दण्ड दे दिया।

6- गुरु हरगोविंद (1606-45)

यह पहले सिख गुरु थे जिन्होंने शस्त्र धारण किये। 1609 में इन्होने अकाल तख़्त की स्थापना की। जहांगीर ने गुरु अर्जुन देव पर लगाये गए जुर्माने की राशि को अब गुरु हरगोविंद से माँगा जो कि उन्होंने देने से इंकार कर दिया तो जहांगीर ने उन्हें दो वर्ष तक ग्वालियर के किले में कैद रखा तो कुछ समय बाद इनसे अच्छे सम्बन्ध बन गए तो जहांगीर ने इन्हे अपनी शाही सेना में रख लिया। शाहजहां से अक्सर इनकी झड़पें होती रहती थी। एक बार शाहजहां का प्रिय बाज उड़ कर गुरु के खेमे में आ गया जिसे उन्होंने देने से मना कर दिया और मन मुटाव बढ़ गया।

7- गुरु हरराय (1645-61)

इन्हे औरंगजेब ने आदिग्रन्थ पर स्पष्टीकरण देने हेतु दिल्ली आमंत्रित किया परन्तु ये स्वयं दरबार में नहीं गए और अपने पुत्र रामराय को भेज दिया। सर्वप्रथम इसी समय गुरु के पद के उत्तराधिकार का प्रश्न खड़ा हुआ और तब औरंगजेब ने हरिकिशन का समर्थन किया फलस्वरूप हरिकिशन सिखो के 8 वें गुरु बने।

8- गुरु हरिकिशन (1661-64)

इन्होंने सिखो को हिन्दू कहा गुरु के रूप में इनका कार्यकाल सबसे कम रहा चेचक के कारण इनकी मृत्यु 1664 में हो गयी। इन्होने अपना उत्तराधिकारी बकाली दे बाबा को चुना था।

9- गुरु तेगबहादुर (1664-75)

बकाला दे बाबा ही गुरु तेगबहादुर के नाम से अगले गुरु बने। ये सिखों द्वारा निर्वाचित प्रथम व एकमात्र गुरु थे। ये मुगलो के साथ असम अभियान पर गए और वहाँ अहोमो व मुग़ल सेना के मध्य समझौता कराया। वहां से बापस लौट के ये आनंदपुर में निवास करने लगे और 11 नवम्बर 1675 को औरंगजेब ने इन्हे मृत्यु दण्ड दे दिया।

10- गुरु गोविन्द सिंह (1675-1708) 

मखोवाल/आनंदपुर में ये गुरु बने और इसी जगह को इन्होने अपना कार्य केंद्र बनाया। इन्हे सच्चा पादशाह की उपाधि दी गयी। इन्हे ब्रज, फ़ारसी और गुरुमुखी भाषाओं का ज्ञान था। 1699 में इन्होने वैशाखी के दिन आनंदपुर में खालसा पंथ की स्थापना की। इन्होने सिखों के लिए नशीले व मादक पदार्थों का निषेध किया और पुरुषों को सिंह और युवतियों को कौर उपाधि अपने नाम के साथ जोड़ने को कहा।इनके विचारों का संग्रह दशम वादशाह  में संकलित है और विचित्र नाटक इनकी आत्मकथा है।गुरुगोविंद ने जफरनामा की रचना फ़ारसी में की यह एक प्रशस्ति है जिसकी रचना औरंगजेब की प्रंशसा में की गयी थी। वे अपनी रचनाएं पोआंटा (हिमाचल प्रदेश) नामक स्थान पे किया करते थे।

इन्होने ही सिखो में पंच ककार (केश, कच्छा, कंघा, कड़ा और कृपाण) का प्रचलन प्रारम्भ किया। इन्होने औरंगजेब से 1700 में आनंदपुर की लड़ाई, 1704 में आनंदपुर की दूसरी लड़ाई और 1705 ईo में खिदराना की लड़ाई लड़ी। इन्ही के दो पुत्रों फतेहसिंह और जोराबरसिंह को मुगलों ने दीवार में जिन्दा चुनवा दिया था। इन्हे एक अफगान ने छुरा भोंक कर मारने की कोशिश की जिसके कारण दो माह पश्चात 1708  ईo में इनकी मृत्यु हो गयी। इन्होने मृत्यु से पूर्व घोषणा की कि इनके बाद गुरु ग्रन्थ साहिब ही सिखो का गुरु और मार्गदर्शक होगा।  

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