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प्रस्तावना से सम्बंधित वाद (Landmark Cases on PREAMBLE) इस लेख में भारत के संविधान की प्रस्तावना से सम्बंधित महत्वपूर्ण वाद से सम्बन्धित तथ्यों को दिया गया है।

यूनियन ऑफ़ इंडिया बनाम मदन गोपाल 1957 –

इस वाद में यह निर्णय दिया गया कि प्रस्तावना को न्यायालय में प्रवर्तित नहीं किया जा सकता।

बेरुबाड़ी यूनियन 1960 के वाद में (AIR1960 SC 845; निर्णीत 14 मार्च 1960) –

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि यदि संविधान की भाषा संदिग्ध हो वहाँ प्रस्तावना इसमें सहायता करती है। इसी वाद में सर्वोच्य न्यायालय ने प्रस्तावना को संविधान का अंग नहीं माना अर्थात अब संविधान के अनुच्छेद-368 (संविधान में संशोधन का अधिकार) के तहत संविधान की प्रस्तावना में संशोधन नहीं किया जा सकता।

केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य 1973 (AIR 1973 SC 1461) –

इसी वाद में सर्वोच्य न्यायालय द्वारा “मूल ढांचे का सिद्धांत” दिया गया और प्रस्तावना को संविधान का मूल ढांचा स्वीकार कर लिया गया। इस वाद के निर्णय ने पिछले निर्णय को रद्द कर दिया और अब से प्रस्तावना को भारतीय संविधान का अभिन्न अंग मान लिया गया और अब इसी के निर्णय के आधार पर प्रस्तावना में विधायिका द्वारा संशोधन किया जा सकता है। लेकिन संसद इसमें किसी भी प्रकार का नकारात्मक संशोधन नहीं कर सकती अर्थात इसमें से कोई काट-छांट नहीं की जा सकती और न ही कोई ऐसा परिवर्तन किया जा सकता है जो इसके मूल उद्देश्यों को परिवर्तित करता हो, हाँ संसद इसमें ऐसा संशोधन अवश्य कर सकती है जो इसके मूल ढांचे को और मजबूत करे व इसका विस्तार करे।

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