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बंगाल के नवाब – भारतीय इतिहास में बंगाल का अपना ही महत्वपूर्ण स्थान रहा है इसका क्षेत्र कृषि के लिए अत्यधिक उपजाऊ और साथ ही साथ राजनीतिक दृष्टि से भी अत्यधिक सुदृढ़ रहा है। प्राचीन काल से ही भारत पर विदेशी आक्रमण होते आये हैं जो कि सारे पश्चिमोत्तर सीमा से ही हुए हैं। बंगाल की भौगोलिक संरचना इसे भारत के सबसे सुरक्षित क्षेत्र के रूप में दर्शाती है। यह कृषि के साथ साथ विभिन्न संस्कृतियों और राजवंशों का केंद्र रहा है। परन्तु मध्यकाल प्रारम्भ होने और मुस्लिम आक्रमणकारियों के आगमन के बाद उनका ध्यान इस क्षेत्र की ओर गया। पहले सल्तनतकाल और बाद में मुगलकाल के शासकों ने इस ओर विशेष ध्यान दिया और बाद में जब यूरोपियन व्यापारियों का आगमन हुआ तो उन्होंने भी इसे अपना व्यापारिक केंद्र बनाने के लिए प्रयास किये। बंगाल में अंग्रेजों ने अपनी पहली व्यापारिक कोठी शाहशुजा की अनुमति से 1651 ईo में स्थापित की। मुग़ल शासक फर्रूखशियर ने 1717 ईo में अंग्रेजो को 3 हजार रूपये में बंगाल में शुल्कमुक्त व्यापार करने की अनुमति प्रदान की।

1700 ईo में औरंगजेब द्वारा मुर्शीद कुल्ली खां को बंगाल का दीवान नियुक्त किया गया और 1717 ईo में फर्रूखशियर ने इसे बंगाल का सूबेदार बना दिया। बाद में 1719 में इसे उड़ीसा भी दे दिया गया।

मुर्शीद कुली खां (1717-27) –

इसने किसानो को तकावी ऋण दिए। इसने भूमि प्रबंधन की इजारेदारी व्यवस्था शुरू की। मुर्शीद कुली खां के समय की सबसे महत्वपूर्ण घटना बंगाल की राजधानी ढाका से मुर्शिदाबाद/मकसूदाबाद ले जाना थी। इसका कारण अजीमुस्सान से उसका मतभेद था। इसके समय तीन जमीदारों के विद्रोह हुए। इसके मृत्यु के बाद अगला नवाब इसका दामाद शुजाउद्दीन बना।

शुजाउद्दीन (1727-39) –

1733 ईo में बिहार को भी इसके अधीन कर दिया गया। इसी ने अलीबर्दी खां को बिहार का नायब सूबेदार नियुक्त किया जो आगे चलकर बंगाल का नवाब बना।

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सरफराज (1739) –

शुजाउद्दीन के बाद इसका पुत्र सरफराज बंगाल का नवाब बना। इसके पिता के द्वारा बिहार के नायब सूबेदार नियुक्त किये गए अलीबर्दी खां ने इसके समय विद्रोह कर दिया। 1740 ईo में हुए गिरिया के युद्ध में सरफराज हार गया और मार डाला गया और अलीबर्दी खां अब बंगाल का नया नवाब बना।

अलीवर्दी खां (1740-56) –

इसने यूरोपियन की तुलना मधुमक्खी से की। इसने अपने पद की वैद्यता पाने के लिए मुग़ल शासक को दो करोड़ रूपये की धनराशि भेजी और पद की वैद्यता पाने के बाद कभी कोई कर मुग़ल शासक को अदा नहीं किया। यह नाममात्र के लिए मुग़ल शासक के अधीन था। मराठो ने इसे बहुत परेशान किया अंत में इसने मराठो से एक संधि कर ली जिसके तहत इसने मराठों को 12 लाख रूपये वार्षिक कर देना स्वीकार कर लिया और साथ ही उड़ीसा प्रान्त भी उन्हें दे दिया। इसी ने अंग्रेजो को स्थायी दुर्ग बनाने की अनुमति प्रदान की थी। इसके बाद इसकी सबसे छोटी पुत्री का पुत्र सिराजुद्दौला नवाब बना।

सिराजुद्दौला (1756-57) –

इसे इसके नाना अलीवर्दी खां ने पहले ही अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। बंगाल के नवाबों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटनाएं इसी के काल में हुयी हैं जो कि भारत के इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान रखती हैं। इसके नबाब बनते ही इसे अपने तीन प्रमुख प्रतिद्वंदियों से निपटना था जिनमें पूर्णिया का गवर्नर शौकत जंग (दूसरी मौसी का बेटा), घसीटी बेगम (सबसे बड़ी मौसी) और अंग्रेज थे। सिराजुद्दौला ने शौकत जंग को तो मनिहारी के युद्ध में 1756 में हरा दिया और मार डाला।

  • 4 जून 1756 को सिराजुद्दौला ने कासिम बाजार पर आक्रमण किया और उसे अपने अधिकार में ले लिया।
  • 15 जून 1756 को कलकत्ता पर आक्रमण कर फोर्ट विलियम पर अपना अधिकार कर लिया, अंग्रेजों ने भागकर फुल्टा द्वीप पर शरण ली।
  • 20 जून 1756 की रात को सिराजुद्दौला ने 146 अंग्रेजो को 18 फुट लम्बी और 10 फुट चौङी एक अत्यंत तंग कोठरी में बंद कर दिया। अगले दिन जब उसे खोला तो मात्र 23 लोग ही जिन्दा बचे जिनमे हाल्वेल भी शामिल थे जिन्होंने इस घटना के बारे में जानकारी दी है। इसी घटना को इतिहास में “ब्लैक होल की घटना” के नाम से जाना जाता है।
  • 2 जनवरी 1757 को क्लाइव और वॉटसन के नेतृत्व में एक सेना ने कलकत्ता पर अधिकार कर लिया। 9 फरवरी 1757 को क्लाइव और नवाब के बीच अलीनगर की संधि हुयी इसी के तहत कंपनी को सिक्के ढालने की अनुमति प्राप्त हुयी।
  • इसी के समय अंग्रेजो ने 13 मार्च 1757 को फ्रांसीसियों से चंद्रनगर छीन लिया।
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प्लासी का युद्ध (23 जून 1757) –

इस युद्ध में मीर जाफ़र ने पद की लालसा में सिराजुद्दौला और देश को धोखा दिया और अंग्रेजो से मिल गया। सिराजुद्दौला मुर्शिदाबाद भाग गया जहाँ मीरजाफर के बेटे मीरन ने मोहम्मद बेग के हाथो उसकी हत्या करा दी। युद्ध के बाद कंपनी को 24 परगनो की जमींदारी मिली और मीरजाफर को बंगाल का नवाब बनाया गया।

मीर जाफर (1757-60) –

प्लासी के युद्ध में अंग्रेजो का साथ देने के बदले इसे बंगाल का नवाब बनाया गया। इसी ने देश में एक बार फिर हिन्दू मुस्लिम बैमनस्य की शुरुवात की जिसका फायदा अंग्रेजो ने बांटो और शासन करो की नीति को अपनाकर उठाया। मीर जाफर अंग्रेजो की लगातार बढ़ती धन की मांग को पूरा नहीं कर पाया अतः बंगाल के गवर्नर वेंसिटार्ट ने नवाब को बदलने का निश्चय कर लिया और मीर कासिम से एक समझौता किया जिसके तहत मीर कासिम को नबाब बनाये जाने के बदले कंपनी को बर्दमान, मिदनापुर और चटगांव की दीवानी प्रदान करना तय हुआ। फिर मीरजाफर को हटाकर 15 हजार मासिक का पेंशनभोगी बना दिया गया।

मीर कासिम ( 1760-63) –

इसने बंगाल की राजधानी मुर्शिदाबाद से मुंगेर स्थापित की क्योकि वह मुर्शिदाबाद के षणयंत्रों और अंग्रेजो के हस्तक्षेप से बचना चाहता था। उसने बंगाल की आर्थिक दशा को सुधारने के बहुत प्रयास किये। उसके सराहनीय कार्यों से अंग्रेज उससे ईर्ष्या करने लगे और असंतुष्ट हो गए। अंग्रेज अधिकारी एलिस ने पटना पर आक्रमण कर अधिकार कर लिया तभी कासिम ने पटना पर आक्रमण किया और अंग्रेजो को बन्दी बना लिया जिससे अंग्रेज नाराज हो गए और जुलाई 1763 में फिर मीर जाफर को नवाब घोषित कर दिया।

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मीर जाफर (1763-65) –

इसके दूसरे काल में फिर एक महत्वपूर्ण घटना घटी जो भारतीय इतिहास में बक्सर के युद्ध के नाम से प्रसिद्द हुयी। पटना की घटना के बाद मीर कासिम और अंग्रेजो के विरुद्ध युद्ध छिड़ गया। मीर कासिम के कहने पर भी अंग्रेजो ने युद्ध नहीं रोका तो उसने सभी अंग्रेज बंदियों की हत्या करवा दी। अब मीर कासिम अवध के नवाब शुजाउद्दौला के पास पंहुचा जहाँ मुगक शासक शाह आलम द्वितीय भी थे। इस प्रकार तीनो ने मिलकर अंग्रेजो के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया और 22 अक्टूबर 1764 को हेक्टर मुनरो के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना और इन तीनो की संयुक्त सेना के बीच बक्सर का युद्ध हुआ जिसमे अंग्रेज विजयी हुए। इसी युद्ध के बाद भारत में अंग्रेजो की वास्तविक प्रभुसत्ता स्थापित हुयी।

नजमुद्दौला (1765-66) –

यह बंगाल का अंतिम नवाब था। बक्सर के युद्ध के बाद क्लाइव पुनः बंगाल का गवर्नर बनकर भारत आया। फरवरी 1765 में मीर जाफर के अल्प वयस्क पुत्र नजमुद्दौला को बंगाल का नवाब बनाया गया।

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