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पल्लव वंश और साम्राज्य (Pallava Dynasty and Empire) – पल्लव का अर्थ होता है लता परन्तु तमिल भाषा में पल्लव से आशय डाकू से है। पल्लव वंश की स्थापना सिंहवर्मा ने की थी। ताम्रलेखों से ज्ञात होता है कि पल्लव वंश का प्रथम शासक सिंहवर्मा था। इनका साम्राज्य पेन्नार नदी से कावेरी तक विस्तृत था। इनकी राजधानी काच्ची थी। इन्होंने नाग वंश के शासकों को पराजित कर काच्ची पर अधिकार किया था। पल्लव शासकों का सर्वाधिक विरोध बादामी के चालुक्यों से था। पल्लवों का सबसे महान शासक शिवस्कन्द था। इसने अश्मेघ व वाजपेय यज्ञ कराये। विष्णुगोप पहला पल्लव शासक था जिसका नाम संस्कृत व प्राकृत दोनों भाषाओं  अभिलेखों में हुआ है। इस वंश का अंतिम महत्वपूर्ण शासक अपराजितवर्मन था। इसकी हत्या इसी के मित्र चोल शासक आदित्य ने कर दी।

दशकुमारचरित और काव्यादर्श के लेखक दण्डी, किरातार्जुनीय के रचनाकार भारवि और तमिल महाभारतम के लेखक पेरूनदेवनार इसी समय हुए। इस काल में वास्तुकला की तीन शैलियों – महेंद्र शैली, मामल्ल शैली, राजसिंह शैली, नंदिवर्मन/अपराजित शैली  का विकास हुआ। मामल्ल शैली में आठ रथ मंदिरों (सप्त पैगोड़ा) का निर्माण हुआ। ये रथ मंदिर एकाश्म पत्थर से बने हैं। सबसे बड़ा रथ धर्मराज रथ है इसी पर नरसिंह वर्मा प्रथम की भी मूर्ति स्थापित है। इनमे द्रौपदी रथ सबसे छोटा और अलंकरणविहीन है। नकुल-सहदेव रथ पर मूर्ति का अभाव है।

सिंहविष्णु (575-600 ईo) –

सिंहविष्णु इस वंश का संस्थापक एवं प्रथम शासक था। यह वैष्णव मत का अनुयायी था। इसने चोल, पाण्ड्य, सिंघल और कलभ्र के शासकों को पराजित किया और चोलमण्डलम पर अधिकार कर लिया। इसके दरबार में किरातार्जुनीय के रचनाकार भारवि निवास करते थे। इसने कला को प्रोत्साहन दिया। इसी के समय मामल्लपुरम में वाराह मंदिर का निर्माण हुआ। इसके बाद इसका पुत्र महेन्द्रवर्मन पल्लव वंश का शासक बना।

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महेंद्रवर्मन प्रथम  (600-630 ईo) –

यह बहुत अच्छा संगीतज्ञ और चित्रकार भी था। इसने रुद्राचार्य से संगीत की शिक्षा ली और नटराज के चित्रों को गुफाओं में स्वयं उकेरा था। प्रारंभ में यह जैन मतानुयायी था परन्तु संत अप्पर के प्रभाव में आकर यह शैव बन गया। पल्लव और चालुक्यों का संघर्ष इसी के समय प्रारंभ हुआ। इस समय चालुक्यों का शासक पुलकेशिन द्वितीय था। इस संघर्ष का मूल कारण गंगा-दोआब पर अधिकार स्थापित करना था। इसने मत्तविलासप्रहसन नामक हास्य ग्रन्थ की रचना की। जिसमें बौद्धों का मजाक उड़ाया गया है साथ ही महेन्द्रवर्मन ने इसमें पुलिस एवं न्याय विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचारों की ओर भी संकेत किया है। द्रविड़ क्षेत्र में चट्टानों को काटकर मंदिर बनवाने का प्रवर्तक महेन्द्रवर्मन को ही माना जाता है। इसके अभिलेखों में व्यास तथा बाल्मीकि की प्रशंसा की गयी है।

नरसिंहवर्मन प्रथम (630-668 ईo) –

यह बहुत अच्छा पहलवान था इसीलिए ये महामल्ल कहलाया। इसी के समय ह्वेनसांग काच्ची आया और इसे महाराज कहा। यह पल्लव वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था। इसी के समय दशकुमारचरित के लेखक दण्डी हुए। इसने अपने सेनापति शिरुतोंड और मानववर्मा (श्रीलंका के अपदस्थ शासक) के माध्यम से चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय को पराजित कर उसकी राजधानी वातापी पर अधिकार कर लिया। इसी युद्ध में पुलकेशिन द्वितीय मारा गया। इसके उपलक्ष्य में इसने वातापीकोण्ड की उपाधि धारण की। इसी उपलक्ष्य में इसने वातापी में मल्लिकार्जुन मंदिर पर अपना विजय स्तंभ स्थापित किया। इसके बाद इसने श्रीलंका अभियान किया और मनाववर्मन को सिंघल की गद्दी पर पुनः स्थापित किया। इसकी जानकारी काशाक्कुडि और महावंश से प्राप्त होती है। महाबलीपुरम इसके राज्य का सर्वप्रमुख बंदरगाह था।

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इसके बाद महेन्द्रवर्मन द्वितीय, परमेश्वरवर्मन प्रथम तदोपरांत नरसिंह वर्मन द्वितीय शासक बना।

नरसिंहवर्मन द्वितीय (700-728 ईo) –

यह परमेश्वर वर्मन प्रथम का पुत्र था। इसका काल शांति का काल था। इसके समय चोल-पल्लव संघर्ष रुक गया। इसने एक  दूतमण्डल चीन भेजा और चीनी बौद्ध यात्रियों के लिए नागापत्तनम में बिहार बनवाया जिसे चीनी पैगोड़ा कहा जाता है। इसने कांची के कैलाश मंदिर और महाबलीपुरम के शोर मंदिर का निर्माण कराया। दण्डिन ने इसकी राजसभा को भी सुशोभित किया।

इसके बाद परमेश्वरवर्मन द्वितीय, दन्तिवर्मन, नंदिवर्मन द्वितीय, नृपतुंगवर्मन, अपराजिवर्मन क्रमशः शासक हुए।

परमेश्वरवर्मन द्वितीय –

परमेश्वरवर्मन द्वितीय इस वंश परंपरा का अंतिम शासक था। इसके बारे में कहा जाता है कि इसने बृहस्पति द्वारा बनाये सिद्धांतों का अनुसरण कर संसार की रक्षा की। यह तिरुमंगलाई का समकालीन था। इसकी आकस्मिक मृत्यु के बादपल्लव वंश (Pallava Dynasty) पल्लव राज्य में संकट उत्पन्न हो गया। इसका कारण था की इसका कोई वैध उत्तराधिकारी नहीं था।

नंदिवर्मन द्वितीय – उसके बाद लोगों ने नंदिवर्मन द्वितीय को  शासक बना दिया। परंतु यह सिंहविष्णु की परंपरा का न होकर भीमवर्मा की परंपरा का था जो कि सामंत हुआ करते थे। यह वैष्णव मत का अनुयायी था। इसने कांची के मुक्तेश्वर मंदिर और बैकुंठ पेरुमल मंदिर का निर्माण कराया।

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नंदिवर्मन तृतीय – यह शैव मत का अनुयायी था। इसने तमिल साहित्य को संरक्षण दिया।

अंत में पल्लव वंश के राज्य को चोल शासकों ने अपने राज्य में मिला लिया।

पल्लव वंश से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य :-

  • दन्तिवर्मन राष्ट्रकूट नरेश दन्तिदुर्ग की पुत्री रेवा की संतान था।
  • अभिलेखों में दन्तिवर्मा को पल्लव कुलभूषण और विष्णु का अवतार कहा गया है।
  • नंदिवर्मन से राष्ट्रकूट नरेश अमोघवर्ष ने अपनी पुत्री शंखा का विवाह किया था।

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