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मालवा का परमार वंश (Paramara Dynasty) – परमार वंश का संस्थापक उपेंद्रराज/कृष्णराज था। उदयपुर लेख में इसे द्विजवर्गरत्न कहा गया है। इस वंश के प्रारंभिक इतिहास को जानने का सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य उदयपुर प्रशस्ति है। परमार का शाब्दिक अर्थ होता है ‘शत्रुओं का नाश करने वाला’। इनकी राजधानी धारा थी। उपेंद्र के दरबाद में सीता नामक कवियित्री रहती थी।

हर्ष या सीयक द्वितीय –

इसे ही परमारों की स्वतंत्रता का जन्मदाता कहा जाता है। इसने नर्मदा नदी के तट पर हुए युद्ध में राष्ट्रकूट नरेश को पराजित कर अपने वंश को राष्ट्रकूटों की अधीनता से मुक्त कराया। इसने हूण राजकुमारों की हत्या कर हूणमण्डल जीता। इसके दो पुत्र मुंज व सिंधुराज थे। इनमे मुंज इसका दत्तक पुत्र था, वही इस वंश का अगला शासक बना। हर्ष ने स्वयं इसे अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।

वाक्यपति मुंज –

इसके पिता ने इसे मूँज पर पड़ा पाया था इसलिए इसका नाम मुंज पड़ा। इसने कलचुरी शासक युवराज को हराकर त्रिपुरी को लूटा। इसके बाद मेवाड़ के गुहिल वंशीय शासक शक्तिकुमार को पराजित कर उसकी राजधानी आघाट को लूटा। इसका चालुक्य वंश के संस्थापक तैलप द्वितीय से संघर्ष शुरू हुआ। इसने तैलप की सेना को 6 बार हराया। परन्तु इसने अंत में अपने मंत्री रुद्रादित्य की सलाह न मानकर गोदावरी नदी को पार कर उससे युद्ध किया। इस बार ये हार गया और बंदी बना लिया गया उसके बाद इसकी हत्या कर दी गयी। इसके दरबार में दक्षिण भारत से आये हलायुध भी रहते थे। इसने धारा में मुंज सागर झील का निर्माण करवाया।

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सिंधुराज –

मुंज के बाद उसका छोटा भाई सिंधुराज अगला परमार नरेश बना। सबसे पहले इसने कल्याणी के चालुक्य नरेश सत्याश्रय को पराजित किया। अंत में यह गुजरात के चालुक्य शासक चामुंडराज से पराजित हुआ।

राजा भोज (1010-55 ईo)-

भोज इस वंश का सर्वाधिक प्रसिद्ध शासक था। भारतीय इतिहास में भोज का काल आर्थिक समृद्धि के लिए जाना जाता है। “कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली” यह कहावत इसी से संबंधित है। इसके बारे में प्रसिद्ध था कि ये कवियों को प्रत्येक श्लोक के लिए एक लाख मुद्राएँ प्रदान करता था। इसने अपनी राजधानी उज्जैन से हटाकर क्षिप्रा नदी पर अवस्थित धारा में स्थापित की। इसका सर्वप्रथम संघर्ष कल्याणी के चालुक्यों से प्रारंभ हुआ। इसमें भोज की सहायता कलचुरी नरेश गांगेयदेव और राजेंद्र चोल ने की। 1024 ईo में भोज ने कोंकण विजय की। इसके बाद इसने उड़ीसा के शासक इंद्ररथ को हराकर उसकी राजधानी आदिनगर को लूटा। अंत में ये चंदेल शासक विद्याधर से पराजित हुआ। भोज के सेनापति कुलचंद्र ने गुजरात के चालुक्य नरेश भीम प्रथम की राजधानी अन्हिलवाड़ को लूटा। इसके शासनकाल में अंतिम समय में कलचुरी नरेश लक्ष्मीकर्ण के नेतृत्व में चालुक्य व चेदियों ने एक संघ बनाया। इन्होने भोज की राजधानी धारा पर आक्रमण किया। भोज चिंता में बीमार पड़ गया और अंत में उसकी मृत्यु हो गयी।

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भोज की मृत्यु पर कहा गया “अघधारा निराधारा निरालम्बा सरस्वती”। 1305 ईo में अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा को सल्तनत में मिला लिया।

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