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सैय्यद वंश (Sayyid Dynasty) दिल्ली सल्तनत पर शासन करने वाला चौथा वंश था। इस वंश की स्थापना तैमूर के सैनिक खिज्र खां ने 1414 ईo में की।

खिज्र खां (1414-21 ईo) –

तैमूर ने भारत से लौटते वक्त खिज्र खां को मुल्तान, दीपालपुर और लाहौर की सूबेदारी सौंपी थी। परन्तु 1414 ईo में तुगलक वंश के अंतिम शासक नासिरुद्दीन महमूद की मृत्यु के बाद इसने दिल्ली सल्तनत पर अधिकार कर लिया। इस तरह अब दिल्ली की गद्दी पर सैय्यद वंश की स्थापना हुयी। खिज्र खां ने कभी सुल्तान की उपाधि धारण नहीं की। उसने स्वयं को रैयत ए आला की उपाधि से संतुष्ट किया। वह तैमूर के चौथे पुत्र व उत्तराधिकारी शाहरुख़ के अधीन मानता था और उसे भारत से राजस्व भेजता रहा। इसने अपने खुतवे में भी शाहरुख़ का ही नाम रखा। इसने सिक्कों पर सदा तुगलक शासकों का ही नाम अंकित करवाया। इसने मलिक तोफा (मलिक-उस-शर्क) को अपना वजीर नियुक्त किया और उसे ताज-उल-मुल्क की उपाधि दी। बुखारा के शेख जलालुद्दीन ने खिज्र खां को सैय्यद कहकर पुकारा था। 1421 ईo में इसकी मृत्यु पर लोगों ने काले वस्त्र पहनकर शोक प्रकट किया।

मुबारक शाह (1421-34 ईo) –

खिज्र खां की मृत्यु के बाद उसका पुत्र मुबारक शाह के नाम से 1421 ईo में शासक बना। खिज्र खां ने अपनी मृत्यु शय्या पर इसे अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था। यह सैय्यद वंश का सबसे योग्य शासक था। इसने शासक बनने के बाद अपने नाम का खुतवा पढ़वाया और अपने नाम के सिक्के चलवाये। इसने अपने पिता के विपरीत विदेशी स्वामित्व को अस्वीकार कर दिया और शाह की उपाधि धारण की। इसका वजीर एक हिंदू धर्म से परिवर्तित मुसलमान मलिक सरवर उल मुल्क था। इसी समय उत्तर-पश्चिम सीमा पर खोखर नेता जसरथ ने विद्रोह कर दिया। इसे दबाने के लिए मुबारक शाह ने अफगान सरदार बहलोल लोदी को भेजा परन्तु ये उनके साथ हो लिया। फरवरी 1434 ईo में जब मुबारक शाह मुबारकाबाद में निरीक्षण कर रहा था तो उसके वजीर मलिक सरवर उल मुल्क ने घोखे से उसकी हत्या कर दी। याहिया-बिन-सरहिंदी अहमद को इसी शासक का राज्याश्रय प्राप्त था।

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मुहम्मद शाह (1434-45 ईo) –

मुहम्मदशाह सैय्यद वंश का अगला शासक 1334 ईo में बना। इसने बहलोल लोदी को पुत्र कहा और उसे खान-ए-खाना या खाने जहाँ की उपाधि दी। क्योंकि यह अपनी राजधानी की दुशमनो से सुरक्षार्थ बहलोल लोदी पर निर्भर था।

अलाउद्दीन आलमशाह (1445-50 ईo) –

यह सैय्यद वंश का अंतिम शासक था। इसका अपने वजीर हमीद खां से झगड़ा हो गया। अतः हमीद खां ने बहलोल लोदी को दिल्ली की गद्दी पर बैठने के लिए आमंत्रित किया। सुल्तान अपनी कमजोर स्थिति को देखते हुए बदायूँ चला गया और 1450 ईo में गद्दी बहलोल लोदी को सौंप दी। इसके बाद वह अपनी मृत्यु (1476 ईo) तक बदायूं पर ही शासन करता रहा।

अगला वंश – लोदी वंश

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