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विषाणु जनित रोग (Viral Diseases) – मानव शरीर में विषाणु या वायरस के कारण होने वाले रोगों को विषाणु जनित रोग (Viral Diseases or Viral Infection) कहते हैं। ऐसे ही रोगों के बारे में इस पोस्ट में दिया गया है –

एड्स (AIDS) –

Acquired Immuno Deficiency Syndrome को ही संक्षिप्त रूप में एड्स/AIDS कहा जाता है। यह रोग Human ImmunoDeficiency Virus अर्थात H.I.V के वजह से होता है। यह रोग संभोग, इन्फेक्टेड रक्ताधान और इन्फेक्टेड इंजेक्शन की सुई के इस्तेमाल से फैलता है। इसके रोगी की रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत घट जाती है। अंततः रोगी की मृत्यु हो जाती है अर्थात यह एक प्राण घातक बीमारी है। इसके रोकथाम के लिए रिबाबाइरीन, सुमारीन, साइक्लोस्पोरीन, अल्फ़ा-इंटरफेरॉन आदि दवाओं का प्रयोग किया जाता है।

चेचक (Small Pox) –

यह एक बेहद संक्रामक रोग है। इसके रोगी को सर, पीठ, कमर और उसके बाद पूरे शरीर में भयंकर दर्द होता है। इसके बाद शरीर पर लाल दाने पड़ जाते हैं। इसके रोगी को सभी से अलग रखना चाहिए। साथ ही घर व आस पास के लोगों को भी इसका टीका लगा देना चाहिए।

पोलियो (Poliomyelitis) –

यह रोग निस्यंदी विषाणु (Filterable Virus) के कारण होता है। इसका प्रभाव केंद्रीय नाड़ी जाल पर होता है। इससे रीढ़ की हड्डी और आंत के कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं। इसके उपचार के लिए बच्चों को पोलियोरोधी दवा दी जाती है। पोलियो के टीके की खोज जॉन साल्क ने की थी परन्तु वह इंजेक्शन द्वारा दी जाने वाली वैक्सीन थी। इसके बाद एल्बर्ट सेबीन ने 1957 में मुख से ली जाने वाली पोलियो ड्राप की खोज की।

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डेंगू ज्वर ( Dengue Fever or Break Bone Fever) –

यह रोग जिस वायरस के कारण होता है उसे एडीज इजिप्टी, एडीज एल्बोपिक्टस, क्यूलेक्स फैटिगंसस द्वारा संचारित किया जाता है। इस रोग में बहुत तेज बुखार आता है और सर, आँख, पेशी व जोड़ों में भयंकर पीड़ा होती है। इसीलिए इसे हड्डीतोड़ बुखार भी कहा जाता है।

पीलिया या हेपेटाइटीस (Jaundice) –

जब मानव रक्त में पित्त वर्णक अधिक मात्रा में पहुँच जाता है तो यह रोग होता है। यह मुख्यतः यकृत से संबंधित रोग है। जब यकृत में पित्त वर्णक का निर्माण अधिक मात्रा में होने लगता है तो वह यकृत शिरा के माध्यम से रक्त में प्रवेश कर जाता है।

रेबीज (Hydrophobia) –

पागल कुत्ते, भेड़िये व लोमड़ी आदि के काटने से इसके विषाणु शरीर में पहुंच जाते हैं। यह रोग सर्वप्रथम इन्ही जंतुओं में होता है। इस रोग का संक्रमण केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में होता है। इस रोग के लक्षण दो रूपों में देखने को मिलते हैं। पहले में रोगी को पानी से डर लगता है और अंत में वह कुत्ते के भौंकने की आवाज निकालने लगता है। दूसरे में रोगी को पक्षाघात (Paralysis), तेज बुखार, उल्टी आना और भयंकर सर दर्द होता है। रेबीज के रोकथाम के लिए इसके टीके की खोज लुई पाश्चर ने की थी।

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मेनिनजाइटिस (Meningitis) –

यह रोग मानव मस्तिष्क को प्रभावित करता है। रोगी को पहले तेज बुखार आता है और बाद में बेहोश हो जाता है।

ट्रेकोमा (Trachoma) –

यह आँख की कॉर्निया से संबंधित रोग है। इस रोग में आँख के कॉर्निया में वृद्धि हो जाती है जिससे रोगी निद्राग्रस्त सा लगता है। इस रोग के उपचार के लिए पेनीसिलीन और क्लोरोमाइसीटीन आदि दवाओं का प्रयोग किया जाता है।

छोटी माता (Chiken Pox) –

यह रोग भी चेचक की भाँति ही अत्यधिक संक्रामक होता है। इसमें हल्के बुखार के साथ शरीर पर पित्तिकाएँ निकल आती हैं। इसके उपचार के लिए चेचक के टीके लगवाने चाहिए।

खसरा (Measles) –

इस रोग का कारक मार्बेली वायरस होता है। यह वायु वाहक रोग है, इसके विषाणु श्वांस लेते समय नाक से शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। इसमें संपूर्ण शरीर प्रभावित होता है। प्रारंभ में आँख से पानी निकलना, ज्वर, सर में दर्द इत्यादि देखने को मिलता है। 3-4 दिन बाद शरीर पर लाल दाने पड़ जाते हैं।

गलसुआ (Mumps) –

इस रोग का कारक मम्पस वायरस है। इस रोग से मानव की लार ग्रंथि प्रभावित होती है। रोगी की लार से ही इस वायरस का प्रसार होता है। शुरुवात में सर दर्द, कमजोरी व झुरझुरी महसूस होती है। एक दो दिन बुखार रहने के बाद कान के नीचे स्थित पैरोटिड ग्रंथि में सूजन आ जाती है। इसके उपचार के लिए नमक के पानी से सिकाई या टेरामाइसिन का इंजेक्शन दिया जाता है।

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