मुंशी प्रेमचन्द

मुंशी प्रेमचन्द का जीवन परिचय

मुंशी प्रेमचन्द उपन्यास सम्राट के उपनाम से विख्यात हैं। इनका जन्म 1880 ई. में लमही गाँव (वाराणसी, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। इनके पिता का नाम अजायब राय और माता का नाम आनन्दी देवी था। इनकी बाल्यावस्था बेहद अभावों में गुजरी। इन्होंने बड़े कष्टों से मैट्रिक्स की परीक्षा उत्तीर्ण की और इंटरमीडिएट में प्रवेश लिया। किंतु परीक्षा में असफल हो जाने के बाद पढ़ाई छोड़ दी। विद्यार्थी जीवन में ही इनका विवाह कर दिया गया। परंतु वह विवाह इनके अनुकूल न था। इसलिए इन्होंने दूसरा विवाह शिवरानी देवी से किया।

करियर

हाईस्कूल पास कर लेने के बाद मुंशी जी ने एक स्कूल में 20 रुपये प्रति माह के वेतन पर अध्यापन का कार्य प्रारंभ कर दिया था। इसके बाद ये स्कूलों के सब-डिप्टी-इंस्पेक्टर हो गए। लेकिन स्वास्थ विगड़ने के बाद इन्हें पद से त्यागपत्र देना पड़ा। उसके बाद ये फिर शिक्षण कार्यों में लग गए। अध्यापन कार्य के दौरान इन्होंने बी.ए. व एम.ए. की डिग्री प्राप्त की। असहयोग आंदोलन प्रारंभ होने पर इन्होंने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद कुछ समय तक इनका जीवन बेहद कष्टों में बीता। 1931 ई. में ये पुनः कानपुर के मारवाड़ी विद्यालय में अध्यापक नियुक्त हुए। कुछ समय बाद ये इस स्कूल के प्राधानाध्यापक हो गए। परंतु प्रबंधकों से मतभेद के कारण ये अधिक समय तक इस पद पर नहीं रह सके और त्यागपत्र देकर विद्यालय से अलग हो गए।


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सम्पादक के रूप में

साहित्य जीवन में प्रवेश करने के दौरान ये सबसे पहले मर्यादा पत्रिका के सम्पादक बने। डेढ़ साल के बाद इन्होंने सम्पादन कार्य छोड़ दिया और काशी विद्यापीठ चले गए। ये काशी विद्यापीठ में प्रधानाध्यापक नियुक्त किये गए। इस पद पर भी ये अधिक समय तक न रह सके। फिर कुछ समय तक इन्होंने माधुरी पत्रिका का सम्पादन किया। इसी दौरान इन्होंने स्वाधीनता संग्राम में भाग लिया। इसके बाद इन्होंने काशी में अपना प्रेस खोला और यहाँ से ‘हंस’ व ‘जागरण’ नामक पत्र निकाले और उनका सम्पादन किया। इनके प्रकाशन में इन्हें बेहद क्षति उठानी पड़ी। तब इन्होंने बम्बई में 8 हजार रुपये के वार्षिक वेतन पर एक फिल्म कंपनी में नौकरी कर ली। कुछ दिन बम्बई में रहने के बाद इनका स्वास्थ्य खराब हो गया। तब ये काशी अपने गाँव आकर रहने लगे। लम्बी बीमारी के बाद 1936 ई. में इनका निधन हो गया।

साहित्य में स्थान –

भारत के महान उपन्यासकार व कहानीकार के रूप में इन्हें साहित्य जगत में उपन्यास सम्राट के रूप में जाना जाता है। इनकी गणना विश्व के महान उपन्यासकार व कहानीकारों में की जाती है। आधुनिक कथा साहित्य का तो इन्हें जनक ही कहा जाता है। ये जितने बड़े उपन्यासकार थे उतने ही बड़े कहानीकार भी थे। प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. द्वारिका प्रसाद ने मुंशी प्रेमचंद के बार में लिखा है “हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में प्रेमचन्द का आगमन एक ऐतिहासिक घटनी थी। उनकी कहानी में ऐसी घोर यंत्रणा, दुःखद गरीबी, असह्य दुःख, महान स्वार्थ और मिथ्या आडम्बर आदि से तड़पते हुए व्यक्तियों की अकुलाहट मिलती है, जो हमारे मन को कचोट जाती है और हमारे मन में टीस पैदा कर देती है।” प्रेमचन्द में साहित्य सृजन की जन्मजात प्रतिभा थी।

प्रारंभिक साहित्य –

इन्होंने प्रारंभ में नवाबराय के उपनाम से उर्दू भाषा में कहानियां व उपन्यास लिखे। उर्दू में इनकी कुछ कहानियाँ ‘धनपतराय’ के नाम से प्रकाशित होती थीं।

सोजे वतन

मुंशी प्रेमचंद की इस क्रांतिकारी रचना ने स्वाधीनता संग्राम के उस दौर में ऐसी हलचल मचाई कि अंग्रेजों को इनकी ये कृति जब्त करनी पड़ी।

प्रेमचन्द नाम

1915 ई. में ‘महावीरप्रसाद द्विवेदी’ की प्रेरणा पर इन्होंने प्रेमचन्द नाम धारण कर, हिन्दी साहित्य जगत में पदार्पण किया। इन्होंने अपने साहित्य सृजन काल में 1 दर्जन उपन्यास और 300 कहानियों की रचना की। इनका यह साहित्य जन हिताय की भावना पर आधारित था।

मुंशी प्रेमचन्द के उपन्यास

  • गबन
  • गोदान
  • कर्मभूमि
  • रंगभूमि
  • निर्मला
  • प्रतिज्ञा
  • कायाकल्प
  • वरदान
  • प्रेमाश्रय
  • सेवादान
  • मंगलसूत्र (अपूर्ण कृति)।

कहानी संग्रह

नवनिधि, ग्राम्य जीवन की कहानियाँ, कुत्ते की कहानी, कफन, प्रेरणा, प्रेम प्रसून, सप्त सुमन, प्रेम गंगा, सप्त सरोज, अग्नि समाधि, समर यात्रा, मनमोदक, प्रेम पचीसी, प्रेम चतुर्थी, मानसरोवर (10 भाग)।

नाटक

प्रेम के वेदी, कर्बला, संग्राम और रूठी रानी।

जीवन चरित

कलम, दुर्गादास, तलवार और त्याग, महात्मा शेख सादी और राम चर्चा।

निबन्ध संग्रह –

कुछ विचार।

सम्पादित –

गल्प रत्न, गल्प समुच्चय।

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